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रविवार, 18 अगस्त 2024

आरती भागवत महापुराण की

 *आरती भागवत महापुराण की।*


आरती भागवत महापुराण की।

जयति जय जय गुण निधान की॥  

श्री कृष्ण शुभचरित गान की॥

आरती अति पावन पुराण की॥

   

जन्म मृत्यु भय नष्ट कारिणी।   

दुख विनासिनी, सुख प्रसारिणी॥

जगत तारिणी, त्रिताप हारिणी।

श्रीमद्  भागवत गूढ़ ज्ञान की।  

आरती भागवत महापुराण की।।


सर्व व्यापी सर्वत्र निवासिनी।    

ईश्वर तत्व रहस्य प्रकाशिनी।

चर अचर जड़ जीव वासिनी॥

निर्मल पावन दिव्य ज्ञान की।

आरती भागवत महापुराण की।।

 

दिव्य अलौकिक पीयूष महारस।

शुक मुख वाचित ज्ञान सुपारस।

धर्म भक्ति विज्ञान सुधारस॥

आरती श्री हरि कृपानिधान की।  

आरती भागवत महापुराण की।।

 

प्रेम पथिक उर रास विलासिनी

प्रमुदित हृदय सुमधुर भाषिणी॥  

सर्वमंगल सर्व सृष्टि हासिनी।

संजीवनी प्रभु चरित ध्यान की॥  

आरती भागवत महापुराण की॥

 

लीलाधर की लीला न्यारी।

दुष्ट दलन सर्व संकट हारी॥

चरण शरण प्रभु हे गिरधारी।  

जय जय जय सर्व सुखनिधान की।   

आरती भागवत महापुराण की॥

 

काम क्रोध मद लोभ नष्ट हो।  

विषय विलास भोग ध्वस्त हो॥

बोधित प्रज्ञा पथ प्रशस्त हो।

मिटे जड़ता, हो गमन ज्ञान की॥

आरती भागवत महापुराण की॥

-उमेश यादव  

शनिवार, 10 अगस्त 2024

आरती त्रिलोकधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥

आरती त्रिलोकधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥

 
स्वयं जगदीश्वर हैं प्रभु आप, हरते मानव मन के पाप। 
 मिटाते मनुजों के त्रयताप, हरो अब जगती के संताप॥ 
 प्रजा के पालक, सृष्टि संचालक, कृपानिधि मंगलकारी की॥ 
 आरती त्रिलोक धारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ 

 कथा में सुरभित प्रेम सुगंध,मन से मिटते सारे द्वन्द। 
 करे जो भागवत का सत्संग, पाते जीवन का आनंद॥ 
 शत्रु की हार, सुखी संसार, प्रभु त्रिभुवन हितकारी की। 
 आरती मुरलीधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ 

 होवे कष्ट मुक्त संसार, पाए मानवता विस्तार। 
 दिखाएं मार्ग मोक्ष का द्वार, कृपा से भवसागर हों पार॥ 
 हरे अज्ञान, बढ़े विज्ञान, बजे धुन वंशीधारी की। 
 आरती मुरलीधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ 

 तुझी में साधन भक्ति ध्यान, तुम्हीं से पाते सिद्धि ज्ञान ॥ 
 स्नेहिल प्रेममयी अभियान, श्रीमद्भागवत ज्ञान महान॥ 
तुम्हीं श्रीराम, तुम्हीं घनश्याम, दुलारे यशोमति प्यारी की। 
 आरती मुरलीधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ 

 देवकी नंदन श्री नंदलाल, सुशोभित मोर पंख हैं भाल॥ 
 करते दुष्ट दलन विकराल, आप ही हैं कालों के काल। 
 पाप संहारक, पुण्य विस्तारक, प्रभु गोवर्धन धारी की॥ 
 आरती मुरलीधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ 

 प्रभु की लीला गुण अनुवाद जहां है प्रेम भक्ति का स्वाद। 
 श्रीमदभागवत दिव्य प्रसाद, पाए प्राणी आशीर्वाद॥ 
 भक्तिमय कथा, मिटाती व्यथा, कृष्ण श्री लीलाधारी की। 
 आरती मुरलीधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ 

 दिया जब शृंगी ऋषि ने शाप,परीक्षित के मन था संताप। 
प्रभु की लीला पुण्य प्रताप, हुआ मन निर्मल और निष्पाप॥ 
 संशय मिटा, आश्रय मिला, कृपा श्री रास बिहारी की॥ 
 आरती मुरलीधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ 

 छोड़कर विषय भोग अनुराग, करें हम जनमंगल हित त्याग॥ 
बजे उर मुरलीधर की राग, बढ़ाएं भागवत से अनुराग ॥ 
 सुदर्शन चक्र, शेष का छत्र, अनुग्रह विपिन बिहारी की॥ 
 आरती मुरलीधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ 
-उमेश यादव

शुक्रवार, 9 अगस्त 2024

आरती श्री गिरधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की।

आरती त्रिलोकधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ (आरती मुरलीधारी की, आरती रासबिहारी की॥) देवों के देव प्रभु हैं आप, हरते मानव मन के पाप मिटाते मनुजों के त्रयताप,हरो अब जगती के संताप, प्रजा के पालक, सृष्टि संचालक, कृपानिधि मंगलकारी की॥ आरती त्रिलोकधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ कथा में सुरभित प्रेम सुगंध। कथा से मिटते सारे द्वन्द। होते दैन्य मनुज के मंद, पाते जीवन का आनंद॥ शत्रु की हार, सुखी संसार, प्रभु त्रिभुवन हितकारी की। आरती त्रिलोकधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ होवे कष्ट मुक्त संसार, पाए मानवता विस्तार। दिखाये मार्ग मोक्ष का द्वार,कथा से भवसागर हों पार॥ हरे अज्ञान, दिलाते ज्ञान, बजे धुन वंशीधारी की। आरती त्रिलोकधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ तुझी में साधन भक्ति ध्यान, तुझी से पाते सिद्धि ज्ञान ॥ सुरभित प्रेममयि अभियान, श्रीमद्भागवत भगवान् ॥ तुम्हीं श्रीराम, तुम्हीं घनश्याम, दुलारे यशोमति प्यारी की। आरती त्रिलोकधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ दयानिधि देवकी माँ के लाल,सुशोभित मोर पंख हैं भाल॥ आप हैं कालों के भी काल। क्रांति की जलती लाल मशाल। पाप संहारक, पुण्य विस्तारक, प्रभु गोवर्धन धारी की॥ आरती त्रिलोकधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ परीक्षित-शुक का शुभ संवाद, प्रभु की लीला गुण अनुवाद। जहां है भक्ति प्रेम का स्वाद, पाए प्राणी आशीर्वाद॥ भक्तिमय कथा, मिटाती व्यथा, कृष्ण श्री लीलाधारी की। आरती श्री गिरधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की। दिया जब शृंगी ऋषि ने शाप, परीक्षित के मन था संताप। शुकदेव परीक्षित वाद, प्रभु की लीला गुण अनुवाद॥ संशय मिटे,आशय मिले, कृपा श्री रास बिहारी की॥ आरती त्रिलोकधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥ छोड़कर विषय भोग अनुराग, करें हम जनमंगल हित त्याग॥ बजे उर बंशीधर की राग, बढ़ाएं भागवत से अनुराग ॥ सुदर्शन चक्र, शेष का छत्र, अनुग्रह विपिन बिहारी की॥ आरती त्रिलोकधारी की। भागवत कृष्ण मुरारी की॥  -उमेश यादव